पिछले कुछ दशकों में जनसंख्या बहुत तेजी से बढ़ी है। जिसके चलते अनाज का उत्पादन और उपभोग मात्रा भी काफी बढ़ गयी है। इस स्थिति में, जनसंख्या का पेट भरने के लिए अब बड़ी मात्रा में खाद्यान की आवश्यकता है। जिसे देखते हुए किसान कम समय में ज्यादा उत्पादन करने के उद्देश्य हेतु खेती करने के लिए जैविक खाद के स्थान पर रासायनिक खाद का उपयोग कर रहा है। रासायनिक खाद अर्थात अजैविक खाद के तेजी से बढ़ते उपयोग के चलते आज हर सीजन में बेमौसम वाला फल, सब्जी भी आसानी से बाजारों में उपलब्ध है। रासायनिक खाद की वजह से कम समय में अधिक खाद्यान वस्तुओं की मात्रा का उत्पादन हो रहा है। रासायनिक खेती की बढ़ती खेती से इसके गम्भीर परिणाम निकल कर आ रहे है। खेती के इस तरीके से मिट्टी अनउपजाऊ होती जा रही है। दूसरे शब्दों में कहे तो मिट्टी अपनी अंदरूनी शक्ति या गुणवत्ता खोती जा रही है। जिस वजह से भविष्य में उपजाऊ खेत की जमीन का हिस्सा संकर्ण होता जा रहा हैं। रासायनिक खेती से पर्यावरण को भी बहुत नुकसान पहुंच रहा हैं। मृदा अपरदन के होने में सबसे बड़ा कारक रासायनिक खाद का बढ़ता प्रयोग ही है। वर्षा के समय में जब रसायन जल मे मिलता है तो यह जल को भी दूषित करता हैं। जिससे जल प्रदूषण की समस्या भी बढ़ती जा रही हैं। इस खेती में जैविक खाद की तुलना में सिंचाई करने के लिए जल भी दुगना लगता है। जिस कारण किसानों को यह खेती करना काफी महंगा पड़ता है। रासायनिक खाद को खरीदने, जल के दुगने खर्चे के होने से किसानों को अपनी लागत की तुलना में कम आय प्राप्त हो पाती है। जिसके चलते उन्हें आर्थिक संकटो से भी झूझना पड़ रहा है। अजैविक खेती मानव, जीव जंतु के स्वास्थ्य के लिए भी बहुत ही हानिकारक है।

पहले के समय में खेती में मुख्य रूप से जैविक खाद का प्रयोग किया जाता था। जिसमें गाय के गोबर को एक गड्ढे में काफी महीनों तक सड़ाकर जैविक खाद प्राप्त की जाती थी। ओर इसी खाद को खेती में प्रयोग लाया जाता था। हालांकि आज के समय भी जैविक खेती को किसान कर रहे है। लेकिन रासायनिक खेती की तुलना में यह संख्या बौनी दिखाई पड़ती है। गाय के गोबर, कृषि और जीवजन्तु के अपशिष्ट से बनी इस खाद की खेती के कई फायदे भी है। जो इस खेती के महत्व और वर्तमान समय में इसकी जरूरत को बयां करने के लिए काफी है। सबसे पहला फायदा यह है कि जैविक खेती, रासायनिक खेती की तुलना में अधिक सस्ती है। जैविक खेती में प्राकृतिक संसाधनों व फसल अवशेषों का सदुपयोग होता है। जिससे गन्दगी भी कम फैलती हैं। साथ ही मिट्टी के उपजाऊपन को बनाए रखने, जल के अति उपयोग पर लगाम लगाने व जल प्रदूषण को रोकने जैसी चीजों के होने से यह पर्यावरण मित्र भी है। पर्यावरण मित्र होने के नाते यह मानव स्वास्थ्य के लिए भी काफी लाभदायक है। क्योंकि मानव और पर्यावरण एक दूसरे से जुड़े हुए है। ऐसे में पर्यावरण पर पडने वाला सकारात्मक या नकारात्मक प्रभाव मानव पर प्रत्यक्ष रूप से पड़ता है।

पिछले दो दशकों में कृषि और इससे जुड़े क्षेत्रो में काफी बदलाव आया है। कृषि में इस्तेमाल हो रही तकनीक भी पहले की तुलना में काफी बदल चुकी है। चाहे वह मिट्टी में बोने वाले बीज की गुणवत्ता हो, सिंचाई और खेती को जोतने वाले सुलभ साधन हो और उर्वरक या रसायनों का उपयोग आदि। कृषि में बदलते इस आयाम में किसानों द्वारा फसलों को कीटों से बचाए रखने के लिए जहरीले कीटनाशक दवाइयों का इस्तेमाल हो रहा हैं। जिस कारण जब ये कीटनाशक दवाइयां वर्षा के समय बहकर दूसरे खेतों में जाते हैं तो यह जहरीला जल दूसरे खेतों को भी दूषित कर देता हैं।

ऐसे में किसानों को रासायनिक खेती की जगह जैविक खेती को प्राथमिकता देकर इसका इस्तेमाल करना चाहिए। साथ ही साथ पिछले 06 सालों में मोदी सरकार द्वारा किसानों से जुड़ी योजनाएं प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना, प्रधानमंत्री किसान मान जन धन योजना, हर खेत को पानी जैसी महत्वपूर्ण योजनाओं के प्रति किसानों को जागरूक व सचेत करने पर बल देना होगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी जैविक खेती की जरूरत और रासायनिक खेती से हो रहे नुकसानों को देखते हुए किसानों से ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा देने की अपील करते हुए एक नई योजना की शुरुआत की। परम्परागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) के तहत प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए सरकार किसानों को प्रति हेक्टेयर 50 हजार की सहायता भी दे रही हैं। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि किसानों को इस योजना के बारे में जानकारी नही है और अगर है भी तो शुन्यमात्र। ऐसे में सरकार को प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए किसानों को जैविक खेती से होने वाले लाभ व उनके जीवन पर पड़ने वाला आर्थिक प्रभाव से परिचित कराना चाहिए। ताकि किसान रासायनिक खेती की बजाय जैविक खेती को करने में ज्यादा रुचि ले।

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