वन संरक्षण

वन मानव जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। प्रारंभिक दौर से ही जगलो की संख्या पृथ्वी पर अधिक रही ,परन्तु धीरे धीरे बढते वैश्वीकरण ने वन की जीवन स्तर को समाप्त कर दिया है, आरंभिक काल मे आदिमानव प्रकृति से स्वयं को जोड़कर रखता था ,और उसी प्रकृति का सम्मान करता था, परन्तु आज का दौर ऐसा है, कि आदिमानव से हम मानव तो बन गए । इस बदलाव के साथ ही मानव प्रकृति से अलग होता चला गया और आज मानो वह प्रकृति जिसमे कुछ जीव-जन्तु ,पेड- पौधे, वातावरण है जिसे वह भूल ही गया है। समय- समय पर पर्यावरण में रहने वाले समस्त जीवो के लिये मानव ने आंदोलनों के साथ इसकी रक्षा की ।

वन को सरक्षित करनें के साथ उससे प्राप्त होंने वाले लाभ को मानव प्राप्त करना चाहता है, अब प्रकृति समझ चुकी है कि उसका ह्रास हो रहा है इस कारण प्रकृति समय-समय पर मानव से इस गलती का भुगतान करनें को कहतीं हैं । अनेक आपदाओं का आना इस बात की ओर संकेत करता है । आज का युवा समझदार व शिक्षित है। इसलिए मानव स्वार्थ को दूर रखकर मानवीय प्रकृति प्रेम को बढ़ाने का संभव प्रयास कर रहा हैं ।

जगलो पर खतरा

  1. वनों पर अवैध कब्ज़े : कभी-कभी जगलो मे रहनें वाले आदिवासी जो जगलो मे स्थाई रूप से रहनें के कारण , वहाँ की जमीन पर स्वयं का हक अदा / जाहिर करते हैं। जिसे प्राप्त होने वाला लाभ स्वयं प्राप्त करतें हैं।
  2. वनों की कटाई : वैश्वीकरण के इस दौर में जनसंख्या बढ़ती जा रही हैं जिस कारण रहनें योग्य भूमि कम पड़ती जा रही है, जिसके कारण वनों को काटकर रहनें योग्य घर बनाए जा रहे हैं
  3. जगलो का विभाजन : जगलो का विभाजन भी किया जाता है, जिसे उसका प्रयोग जगलो के अलावा जनजीवन या पर्यटक स्थल बनाने मे किया जा सके ।
  4. चरागाह द्वारा प्रयोग करना : कभी-कभी चरागाह अपने पशुओं को एक ही स्थान पर चराने अथात् घास खिलाने एक ही स्थान पर ले जाते हैं, जिसके कारण अति चरण आरंभ हो जाता है तब भूमि बंजर होना शुरू हो जाती है।
  5. जगलो मे आग लगना : भारत का लगभग 23%भाग वन है। जिसमें से 21.40% वनों में आग उनकीं लंबाई व घने होने के कारण लगतीं हैं और वनों में 50% आग मानवजनित कारणों से लग जाती है। जिसमें प्रायः खन्न करना व सुखे पत्तों को जगलो मे जलाना शामिल हैं। इसके साथ ही 54.40% वनों को अनाक्षित किया गया है और लोगों उन्हें अपनें इस्तेमाल के लिए आग लगा देते हैं। फिर उनका इस्तेमाल फैक्ट्री, घर बनाने मे प्रयोग करते हैं। 7.49% वन मे आग पृथ्वी का ताप बढ़ने व 2.40% बढती दुर्घटनाओ के कारण लगतीं हैं।

जगलो में आग लगने के कारण

मानवजनित कारण

  1. झूम खेती करना : कभी-कभी झूम खेती करनें वाले चरागाह जगह- जगह रहकर धरती को उपजाऊ बनाने के लिए भी जगलो मे आग लगा देते हैं।
  2. समतल भूमि हेतू वनों की कटाई/ सफ़ाई : जगलो को समतल भूमि में बदलना जिससे उसे घरेलू या सार्वजनिक रूप में इस्तेमाल करनें के लिए भी जगलो को कटा या जलाया जाता है।
  3. शिकारी द्वारा शिकार करना : जगलो मे अक्सर शिकारी शिकार करनें जातें हैं जिस कारण वहाँ के जन्तुओ की संख्या मे भी भारी गिरावट आई है और ये शिकारी जगलो को भी आग लगा देते हैं। जिसमें कुछ वन्य प्रजाति, जन्तु प्रजाति समाप्त हो जाती है।
  4. जंगली घास को समाप्त करनें के लिए जगलो मे आग लगना : जगलो में कभी-कभी जंगली घास उग जाती है जिसे अन्य चीजों की गुणवत्ता में कमी आनें लगतीं हैं जिसे रोकने के लिए खरपतवार को समाप्त करने के लिए उनमे आग लगाई जाती है ।परन्तु यह आग धीरे-धीरे बड़ा रूप ले लेती हैं और बडे स्तर पर जगलो को नुकसान पहुंचाती हैं ।
  5. वनों/ जगलो मे प्रायः बीड़ी, सिगरेट, और अन्य ज्वलनशील पदार्थों के कारण भी जगलो मे आग लगना स्वाभाविक है जिसमें मासूम प्रजातियाँ चाहें वह जन्तु या पेड-पौधे की जलकर राख बन जाती हैं
  6. जगल का विखंडन अतः प्रकीर्ण के साथ मानव निवास स्थान के लिए किया जाता है।

पर्यावरणीय कारण

  1. तापमान का बढ़ना : पृथ्वी पर लगातार तापमान बढता जा रहा है ,क्योंकि आज के इस वर्तमान युग मे वाहनों से निकालता प्रदूषण इसका सबसे बड़ा उदाहरण है , जो पर्यावरण को दूषित करने का कारण बनी हुई है ।
  2. बिजली कडकना : जगलो मे आग लगने का दूसरा मुख्य कारण हैं। कभी-कभी जब बारिश के समय बिजली कडकती हैं । ऋणात्मक व धनात्मक आवेश मिलकर बिजली उत्पन्न करतें हैं जो धरती पर बिजली के रूप में आकर पेड़- पौधों से टकराकर आग का रूप ले लेते है।
  3. चट्टानों का टूटना : वन जो की ऊँचाई वाले क्षेत्रों मे भी पाए जाते है । पठारीय व पहाड़ी क्षेत्रों मे से चट्टान गिरने जैसी क्रिया होती है । यह एक आम बात है परन्तु यह आम बात जब नहीं रहतीं जब यह चट्टान एक दूसरे से टकराकर आग का रूप लेकर जगलो मे आ गिरती है और वहाँ की जनजाति समूह, वन्य जीव और वनस्पति को नुकसान पहुंचाती हैं ।
  4. दीर्घकालीन सुखा पडना : सुखा पडने की स्थिति में भी घने जगलो मे आग लगन जाती है। क्योंकि घने जंगल का अर्थ घने पेड़-पौधों से है जिसकी पत्तियों आमतौर पर एक दूसरे से रगड़ खातीं है, जिसे घर्षण उत्पन्न होता है,और स्वाभविक रूप से आग मे बदल जाती है ।
  5. सदियों मे अयोग्य बारिश : सदियों में अयोग्य बारिश के कारण वनों मे वन्य जीव-जन्तुओं के जीवन व पेड़-पौधों की प्राजातियाँ को अस्त-व्यस्त कर देती है, पेड़-पौधों को यह वर्षा नुकसान देतीं है ।
  6. बाँस के वृक्षों के बीच घर्षण : बाँस का पेड़ मुख्य रूप से सूखा पेड़ होता है जिसमें जल की मात्रा ना के बराबर होती है। बाँस के जगलो मे उसकी पत्तियों आपस में रगड़ खातीं है जिसे घर्षण उत्पन्न होता है जो धीरे-धीरे आग का रूप ले लेती है ।

समाधान

  1. जगलो में आग लगने वाले क्षेत्रों की पहचान करना और उनकी प्रजाति की रक्षा के लिए विशेष प्रकार का प्रावधान करना ।
  2. जनता को जागरूक करनें के लिए जागरूकता अभियान चलना जिसे आम लोगों को जगलो मे रहनें वाले जीव-जन्तुओं, पेड़-पौधों आदिवासियों के बारे में जान सकें और उनकी रक्षा के लिए अपना सुझाव दे सके।
  3. जगलो में रहनें वाले आदिवासी जनजातिय समूह को उनके अधिकार देकर जंगलों की रक्षा की जा सकती है।
  4. वनों में प्रयोग होने वाली हानिकारक पदार्थों के उपयोग को रोकना आवश्यक है।
  5. जगलो में आग लगने पर सूचना मिलने वाले यत्रो का प्रयोग करना जिसे जगल को समय रहते नष्ट होने से बचाया जा सके ।
  6. आदिवासियों की सस्कृति का उचित प्रयोग करना चाहिए। क्योंकि ये प्राजातियाँ पर्यावरण को ईश्वर मान कर पूजा करती है ।
  7. जनजातियां जो जगल मे रहती है,उनके साथ हिस्सेदारी कर जगल की घेराबंदी कर देना चाहिए।

वृक्षारोपण

वृक्षारोपण में ध्यान रखनें योग्य

  1. वृक्षों की गुणवत्ता व उपयोगिता के आधार उनको लगाया जाना चाहिए । जिसे उनके विषय मे जानकारी एकत्र की जा सकें और शीघ्र ही घटित होने वाली घटना के उपाय के बारे में समझा जा सके ।
  2. विलुप्त होने वाली वन्य प्रजातियों के सरक्षण को बढ़ाने चाहिए ।जिसे वह पर्यावरण को बचाने मे वह प्राजातियाँ अपना योगदान दें सकें।
  3. जगली पशुओं के चरने वाले पेड़-पौधों का भी सरक्षण करना चाहिए , जिसे उनसे प्राप्त होने वाले फलों और कदमूल का सेवन करके वह जीवित रह सकें ।
  4. वैकल्पिक ऊर्जा के प्रयोग को बढ़ावा देना तथा घरेलू ईधन का प्रयोग को बढ़ाना ।
  5. सामाजिक वन निमार्ण और वन्य कृषि को बढ़ाना चाहिए। जिसे जगलो को घरेलू इस्तेमाल के लिए काटना ना पड़े ।
  6. अभिसरण योजना को वनरोपण के लिए प्रयोग करना ।
  7. निम्नकोटीकृत जंगल क्षेत्रों को सामान्य जमीन से जोड़ना चाहिए ।
  8. वन्य परिस्थिति के सुधार हेतु हर संभव प्रयास करना चाहिए , जो मानव जीवन और अन्य जीव-जन्तुओ ,पेड़- पौधों, वातावरण की शुद्धता को सुधारने मे प्रकृति स्वयं योग्यदान दे ,और मानव उस योगदान का आभार व्यक्त ह्दय से कर सकें।

निष्कर्ष

सभी प्राजातियाँ के सरक्षण मे आज का समाज महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा हैं । जिसे समय रहते उन प्राजातिययों को नष्ट होने से बचाया जा सके ।

भारत सरकार राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर भी हर संभव प्रयास कर रही है ।

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